मेवाड़ शैली | उदयपुर, देवगढ़, नाथद्वारा | 3 उपशैली | चित्रकला राजस्थान | mewar shaili

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मेवाड़ शैली | mewar shaili

मेवाड़ शैली – अरावली पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य स्थित मेवाड़ भूखण्ड जो सन् 1948 ई . में राजस्थान प्रदेश में विलय हुआ , आज चित्तौड़ , उदयपुर एवं भीलवाड़ा जिलों में वर्गीकृत है । मेवाड़ शैली को आरम्भिक राजस्थानी चित्रकला के प्रथम दर्शन का स्रोत कहा जाता है । मेवाड़ में मेव अथवा मेर जाति के लोगो का निवास करने के कारण इसे ‘ मेवाड़ ‘ एवं ‘ मेदपाट ‘ कहा जाता रहा । यह दोनों शब्द 10 वीं शताब्दी से प्रचलित रहे हैं ।

मेवाड़ शैली के आरम्भिक चित्र

मेवाड़ क्षेत्र की रूचि चित्रकला के प्रति अलग ही देखने को मिलती है, मेवाड़ शैली के आरम्भिक चित्र बहुत से ग्रंथो में देखने व उनके बारे में पढ़ने को मिलते है जो निम्न प्रकार से है –

सुपांसनाह चरियम् ‘ ( सुपार्श्वनाथचरितम् )

सुपांसनाह चरियम् ‘ ( सुपार्श्वनाथचरितम् )यह अपभ्रंश शैली में निर्मित एक जैन ग्रन्थ है इसका रचनाकाल सन् 1423 ई . है । यहाँ प्रमुख रूप से आहड़ जैसे स्थानों से प्राप्त प्राचीनतम ( 2000 ई.पू. ) चित्रकृति इसके साक्षी हैं । आहड़ में मिले कुछ अन्य चित्र कृतियों में सावग – पड़िककमसुत चुन्नी ‘ ( कप्रति कमणसूत्रचूर्ण ) का नाम आता है , जो लगभग 1260 ई . में उदयपुर के आहड़ स्थान पर हो ‘ गुहिल्ल तेजसिंह ‘ के समय चित्रित हुई थी ।

महाराणा लाखा ,मोकल एवं कुम्भा के काल को आन्तरिक शांति का काल कहा गया है, इस समय चित्रकला का दूसरा सचित्र ग्रन्थ ‘ कल्पसूत्र ‘ है जो सोमेश्वर ग्राम ‘ मोहवाड़ ‘ में चित्रित किया गया ।

गीत गोविन्द आरण्यायिका

गीत गोविन्द आरण्यायिका नमक एक अन्य सचित्र ग्रन्थ है , जो अभी हाल ही में प्राप्त हुआ है । उसके लेखो व इतिहासकारो के अनुसार यह मेवाड़ के ‘ गोगुन्दा नामक ‘ स्थान पर चित्रित हुआ है । इस ग्रन्थ में लिखी हुई भाषा के आधार पर इसका समय सन् 1455 ई . निश्चित किया जा सकता है । क्युकी इसकी चित्र शैली भी इसी समय की बनाई हुई लगती है । अतः इन सभी प्राप्त चित्रित ग्रंथो को मेवाड़ शैली के प्रारम्भिक उदाहरण के रूप में जाना जाता हैं , यही से मेवाड़ शैली के चित्रांकन का स्वरूप उभरा व प्रचलित हुआ ।

चौरपंचाशिका ग्रंथ

मेवाड़ शैली
मेवाड़ शैलीचौरपंचाशिका चम्पावती

चौरपंचाशिका ग्रंथ – कुछ समय बाद मेवाड़ शैली का उजला रूप हमें सन् 1540 ई .में विल्हण द्वारा बनाई चौरपंचाशिका ग्रंथ के चित्रों में देखने को मिलता है । चम्पावती विल्हण नामक चित्र इसका प्रमुख व सुन्दर उदाहरण है । यह ग्रन्थ प्रतापगढ़ में चित्रित हुआ है । डगलस बैरेट एवं बेसिल ग्रे ने चौरपंचाशिका शैली का का प्रारम्भ मेवाड़ में माना है।

मेवाड़ शैली का स्वर्ण काल | चित्रकला का विकास

मेवाड़ शैली का स्वर्ण कालमहाराणा कुम्भा का शासनकाल मेवाड़ के इतिहास में कला का स्वर्ण युग कहा गया है। इनका काल ( 1433 से 1468 ई . ) माना जाता है, महाराणा कुम्भा स्वयं कवि, कला संरक्षक एवं संगीतज्ञ भी थे ।

महाराणा कुम्भा के कार्यकाल में चित्रित ग्रन्थ | ( स्वर्ण काल )

राणा कुम्भा के कार्य काल चित्रित ग्रन्थ – महाराणा कुम्भा के कार्यकाल को मेवाड़ शैली का प्रमुख अंग भी माना जाता है। महाराणा कुम्भा के कार्यकाल में कुछ ग्रंथो को प्रकाशित किया गया जो निम्न प्रकार से है। –

1 -संगीत राज
2 -सूत्रधार मंडन द्वारा रचित देवतामूर्ति प्रकरण
3 -राजवल्लभ मंडन
4 –रसिकाष्टक
5 –गीत – गोविन्द – 1492 – 1435 ई .
6 –बालगोपाल स्तुति – 1492 -1435 ई .
7 -प्रसाद मंडन
8 -रूप मंडन आदि ।

इन ग्रन्थों में मूर्तिकला के साथ रंगों की भी जानकारी दी गई है । तथा विशेष रूप से राजवल्लभ मंडन नमक ग्रन्थ में तो चित्रकला विषयक सामग्री के बारे में बताया गया है है ।

महाराणा कुम्भा के स्वरचित ग्रन्थ ‘ संगीत राज ‘ में नाट्यशालाओं के चित्रों का उल्लेख है । उन्होंने गीत – गोविन्द , बालगोपाल स्तुति एवं रसिकाष्टक ग्रन्थों आदि कई सुन्दर ग्रन्थों की रचना करवाई । चित्तौड़ व कुम्भलगढ़ किलों में स्मारक आज भी कुम्भा संस्कृति के जीवित उदाहरण मिलते हैं ।महाराणा कुम्भा के कार्यकाल के बाद राणा सांगा गद्दी पर बैठे । तथा राणा सांगा के बाद संग्राम सिंह ( 1509-1528 ई . ) ने मेवाड़ की सत्ता में रहे तथा वह मेवाड़ को सुदृढ़ बनाते हुए बाबर से भी युद्ध किया।

मीराबाई व भोजराज का विवाह

मीराबाई व भोजराज का विवाह – राणा सांगा के पुत्र ‘ भोजराज ‘ का विवाह मीराबाई से हुआ, जो एक वैष्णव भक्त थी। उस समय वैष्णव सम्प्रदाय अत्यंत फल – फूल रहा था पर था। मीराबाई के गाये भक्ति पद आज भी गुजरात, बुंदेलखण्ड तथा राजस्थान के लोकप्रिय गीत हैं ।

भागवत पुराण का परिजात अवतरण | चावण्ड

भागवत पुराण का परिजात अवतरण | चावण्ड -राणा सांगा व संग्राम सिंह के बाद – राणा ‘ उदयसिंह ‘ ने अकबर के आक्रमणों का सामना तो किया , परन्तु अन्त में उन्हें अपनी राजधानी चित्तौड़ को छोड़ना पड़ा , तथा नवीन राजधानी उदयपुर की स्थापना करनी पड़ी। इस काल में बने चित्रों में भागवत पुराण का परिजात अवतरण ( 1540 ई . ) मेवाड़ के चित्रकार ‘ नानाराम ‘ की कृति है जो अमेरिका के नस्ली हारा मानिक संग्रह में सुरक्षित है । राणा उदयसिंह के उत्तराधिकारी ‘ महाराणा प्रताप ने मुगलों से लोहा लिया और छप्पन की पहाड़ियों में स्थित चावण्ड को अपनी राजधानी बनाया । इस काल में मुगल शैली से प्रभावित सचित्र ग्रन्थों में प्राचीनतम कृति ‘ ढोलामारू ‘ ( 1592 ई . ) है , जो राष्ट्रीय संग्रहालय , नई दिल्ली में सुरक्षित है। इस प्रकार मेवाड़ के बदलते राजनीतिक परिवेश में कुम्भलगढ़ , चित्तौड़गढ़ , चावण्ड एवं उदयपुर प्रारम्भिक मेवाड़ी चित्रकला के केन्द्रों के रूप में उभरे ।

रागमाला के चित्र

महाराणा प्रताप के बाद -‘ राणा अमरसिंह प्रथम ‘ ने मुगलों की आंशिक अधीनता स्वीकार कर ली। इस काल में सन् 1605 ई . के ‘ रागमाला ‘ के चित्र ‘ चावण्ड ‘ में निर्मित हुये । इन चित्रों को ‘ निसारदीन ‘ नामक चित्रकार ने चित्रित किया । इन चित्रों पर मुगलिया प्रभाव छन – छन कर आने लगा था। रागमाला राष्ट्रीय संग्रहालय , दिल्ली में है ।

लघु चित्रों का निर्माण

राणा राजसिंह का पुत्र राणा ‘ जयसिंह ‘ मेवाड़ के सिंहासन पर बैठा । वह स्वतंत्र व शांतिप्रिय शासक था । वह राजसिंह जैसा योग्य तो था , लेकिन उसे निर्बल शासक कहा जाता है राणा राजसिंह के काल में लघु चित्रों का निर्माण अधिकता से हुआ । कहा जाता है कि लघु चित्रों की संख्या की दृष्टि से यह काल उल्लेखनीय है , परन्तु कलम की बारीकी और सफाई की दृष्टि से अधिक विशेष नहीं है।

इस काल में तिथियों सहित जो कुछ भी सामग्री मिली है , नवलगढ़ के कुँवर संग्राम सिंह के संग्रह में उपलब्ध थे जी निम्न प्रकार से है –
1- गीत गोविन्द ‘ संबंधी चित्र
2- श्रीमद्भागवत पुराण संबंधी श्री गोपीकृष्ण कनोड़िया
3- पटना के संग्रह में उपलब्ध चित्र , प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान
4- उदयपुर में उपलब्ध अनुमानतः विक्रम संवत् 1720 से 1735 ( 1663-1678 ई . ) की समयावधि में चित्रित ‘ श्रीमद्भागवत के 10 चित्र ‘
5- अनुमानतः सन् 1680 से 1700 ई . के मध्य चित्रित संप्रति भारत कला भवन
6- वाराणसी में संरक्षित ‘ भागवत पुराण ‘ संबंधी चित्र सरस्वती भवन पुस्तकालय
7- उदयपुर में संरक्षित ‘ रागमाला , एकादशी महात्म्य ,कादम्बरी
8- राजकीय संग्रहालय उदयपुर में संरक्षित – मुल्ला दो प्याजा ,पृथ्वीराजरासो , रघुवंश , रसिक प्रिया , सूरसागर , पंचाख्यान , सारतत्त्व , सारंगधर
से संबंधित चित्र सत्रहवीं शताब्दी उत्तरार्द्ध काल के मेवाड़ के लघु चित्रांकन के विकास को प्रकट करते हैं ।

राणा अमरसिंह द्वितीय कालीन चित्र

राणा जयसिंह के पश्चात् ‘ राणा अमरसिंह द्वितीय ‘के काल में स्थापत्य कला एवं चित्रकला की दृष्टि से परिवर्तन का काल कहा जाता है । इनके काल में बने ‘ शिवप्रसन्न ‘ एवं ‘ अमर विलास महल ‘ मुगल स्थापत्य पर आधारित हैं । इन्हें आजकल ‘ बोडी महल ‘ के नाम से पुकारा जाता है । राजकीय संग्रहालय , उदयपुर में महाराणा अमरसिंह ‘ कालीन चित्रों में ‘ रसिक प्रिया ‘ के 46 लघु चित्र विषेशतः उल्लेखनीय हैं ।

महाराणा संग्रामसिंह द्वितीय के काल में मेवाड़ी चित्रकला पुनः नई तकनीकों पर काम करती है है । उस समय के मेवाड़ी चित्रों में मुगलिया प्रभाव अधिक दिखाई देने लगा था।
उदाहरण – सरस्वती भंडार , उदयपुर में संगृहीत ‘ बिहारी सतसई ‘ है । अन्य प्रमुख ग्रन्थों में ‘ गीत गोविन्द ‘ , ‘ सुन्दर शृंगार ‘ , ‘ मुल्ला दो प्याजा ‘ के लतीफे और ‘ कालिया दमन ‘ हैं ।

लघु चित्रों की परम्परा का अंत

महाराणा संग्रामसिंह द्वितीय के काल के पश्चात् साहित्यिक ग्रन्थों के आधार पर ही लघु चित्रों की परम्परा लगभग समाप्त हो जाती है ।

बड़े पन्नों पर चित्रण का प्रारम्भ

महाराणा हमीरसिंह के काल में बड़े पन्नों पर चित्र बनाने की परम्परा शुरू हो गयी थी । शिकार एवं विभिन्न त्यौहारों पर चित्र अधिक बनाये गये ।

मेवाड़ के इतिहास का अन्तिम चरण ‘ महाराणा भीमसिंह का काल है , जो चित्रकला के लिए विशेष है । सन् 1818 ई . में अंग्रेजों से मेवाड़ राज्य की संधि हो गई थी , जिसके कारण मेवाड़ को मराठा एवं पिण्डारियों के उत्पात से मुक्ति मिल गई थी । इस काल में ‘ भित्तिचित्रों का निर्माण अधिकता से हुआ।
उदाहरण – मरदाना महल , बापना की हवेली , एकलिंग मंदिर के पीठाचार्य के निजी निवास स्थान पर बने भित्तिचित्रों तथा ‘ कुम्भलगढ़ , नाथद्वारा में बने भित्तिचित्र प्रमुख हैं ।
इस काल का एक महत्त्वपूर्ण एलबम राजकीय संग्रहालय उदयपुर में संगृहीत है , जिसमें मेवाड़ के राजाओं के अतिरिक्त मीरा का चित्र भी विद्यमान है । यह भक्ता कलाकार द्वारा चित्रित है ‘ महाराणा भीमसिंह का जुलूस ‘ साहब्दीन कलाकार द्वारा चित्रित है । इस प्रकार मेवाड़ शैली की मुगलिया प्रभाव से मिली आकृति राजदरबारों, ठिकानों तथा वैष्णवपीठों में 19 वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक चलती रही थी ।

मेवाड़ में उदयपुर के अतिरिक्त , अन्य कई स्थानों पर समय – समय पर चित्रकला होती रही , जिनमें चित्तौड़ , चावण्ड और नाथद्वारा प्रमुख हैं ।

मेवाड़ चित्र शैली की विशेषताएँ

( 1 ) प्रकृति।
( 2 ) पुरुषाकृति तथा वस्त्राभूषण।
( 3 ) स्त्री आकृति तथा वस्त्राभूषण।
( 4 ) विषय।
( 5 ) हाशिये।
( 6 ) स्थापत्य।
( 7 ) रात्रि दृश्य।
( 8 ) पशु पक्षी।
( 9 ) परिप्रेक्ष्य।
( 10 ) रंग।
( 11 ) भाव।

प्रकृति

( 1 ) प्रकृति – मेवाड़ के चित्रकारों ने प्रकृति को आलंकारिक रूप में चित्रित किया है । पर्वत तथा चट्टानों इत्यादि को बनाने में आलेखन और अलंकरण को ही महत्त्व प्रदान किया है , जो मुगल तथा फारसी शैली में अंकित है । पृथ्वी को ज्यादातर लाल , हरे एवं पीले रंग से चित्रित किया गया है । कुंजों , लताओं , वृक्षों और पुष्पों की अधिकता है । वृक्षों के पत्ते , पुष्पित पौधे या पेड़ के पत्तों के साथ पुष्पों के गुच्छे अंकित किये गये हैं । कुंज अर्धचन्द्राकार मेहराबों की भाँति तथा उन पर छाई पुष्पित लताओं से बनाये गये हैं । जल को अपभ्रंश शैली के समान टोकरी बुनने वाले अभिप्रायों से चित्रित किया गया है , जो अलंकरणयुक्त है । आम्रवृक्ष , अशोकवृक्ष इत्यादि के अंकन में नैसर्गिकता लाने की चेष्टा की गयी है , तथापि सजावटी वृक्षों , पौधों में कृत्रिमता दिखाई देती है ।

पुरुषाकृति तथा वस्त्राभूषण

( 2 ) पुरुषाकृति तथा वस्त्राभूषण – पुरुष मानवाकृतियाँ लम्बी , चेहरा गोल व अंडाकार है । चिबुक और गर्दन का भाग अधिक भारी तथा पुष्ट बनाया है । मुख पर बड़ी बड़ी मूंछें और विशाल नेत्र हैं । अधर प्रायः खुले हुए , सिर पर मेवाड़ी – पगड़ी , जिस पर काली कलगी , सरपेच , कानों में मोती , गले में मणियों के हार तथा लम्बा जामा , कमर में दुपट्टा , पायजामा और जूतियाँ हैं , जो राजसी वैभव दर्शाती हैं ।

स्त्री आकृति तथा वस्त्राभूषण

( 3 ) स्त्री आकृति तथा वस्त्राभूषण – स्त्रियों की मीनाकृति आँखें , भरी हुई चिबुक , अधर कुछ खुले हुये , मुखाकृतियाँ प्रभावोत्पादक कमनीयता लिये हुए विविध मुद्राओं में अंकित है । लहंगा , पारदर्शक लूगड़ी , कमर तक चोली लटकती हुई , कपोलों पर झूलते केश , जो केश कभी कानों के ऊपर वेणी से बंधे हुये चित्रित होते थे , लम्बी नासिका नथ युक्त , आभूषणों में स्त्रियाँ कर्णफूल , कंगन , बाजूबंद , बोर , पायल पहने हैं ।

विषय

( 4 ) विषय – मेवाड़ शैली में विभिन्न प्रकार के विषयों का समावेश है । ‘ बिहारी सतसई ‘ , ‘ सूरसागर ‘ , ‘ पंचतन्त्र के उपाख्यान ‘ , ‘ कादम्बरी की अद्भुत कथा ‘ , ‘ पृथ्वीराज रासो ‘ , ‘ गीत – गोविन्द ‘ , ‘ रसिक प्रिया ‘ , ‘ कविप्रिया ‘ , ‘ मधु – मालती ‘ , ‘ नल – दमयन्ती ‘ इत्यादि अनेक कथाओं और कविताओं को चित्रित किया है । चित्रकार द्वारा अंकित ग्राम्य जीवन , दरबार , जुलूस , विवाह , उत्सव , संगीत , नृत्य , अन्तःपुर , युद्ध , आखेट संबंधी दृश्यों , स्त्रियों के जल – विहार , नौका – विहार , काँटा निकालते , घोड़ों की दौड़ , दीपावली , होली के उत्सव , नायिकाभेद , राग – रागिनी चित्रावली रामायण एवं कृष्ण लीलाएँ प्रमुख विषय रहे हैं ।

हाशिये

( 5 ) हाशिये – हाशिये प्रायः लाल रंग के बनाये जाते थे ( हिंगुल और सिन्दूर रंग के मिश्रण से ) , कहीं – कहीं हाशिये सपाट लाल या पीली सादा पट्टियों से निर्मित होते थे ।

स्थापत्य

( 6 ) स्थापत्य – भवन भवनों में दार्ष्टिक परिप्रेक्ष्य का प्रयोग किया गया है । चित्रों की पृष्ठभूमि या चित्रों के मुख्य भाग में योजना को ठोस स्वरूप प्रदान करने के लिए भवन को सफेद रंग से चित्रित किया गया है , जो मुगलकालीन है । भवनों के शिखर , छज्जे एवं चबूतरे गुम्बदाकार बनाये गये हैं ।

रात्रि दृश्य

( 7 ) रात्रि दृश्य – गहरी नीली या धुएँ के रंग की पृष्ठभूमि में सफेद बिन्दियों को लगाकर चित्रकार ने तारों से पूर्ण रात्रि का दृश्य चित्रित किया है । कहीं – कहीं रात्रि में तारों के साथ चन्द्रमा भी अंकित है । दिन का दृश्य अंकित करने के लिये केवल आकाश का रंग बदल दिया गया है ।

पशु पक्षी

( 8 ) पशु पक्षी – पशु – पक्षी के चित्रण में कलाकारों ने अपभ्रंश शैली की ही नकल की है और वे आलंकारिक ढंग से निर्मित हैं , किन्तु मुगल प्रभाव के कारण हाथी , घोड़ों , हिरण , कुत्तों इत्यादि में यथार्थता एवं भावुकता दर्शायी गई है । पक्षियों में चकोर , हंस व मयूर प्रमुख हैं ।

परिप्रेक्ष्य

( 9 ) परिप्रेक्ष्य – चित्र की मुख्य घटना की ओर दृष्टि केन्द्रित करने के लिये प्रमुख घटना को प्रायः चित्र के मध्य में और गौण घटनाओं को प्रायः इधर – उधर संयोजित करने की चेष्टा की है । सम्पूर्ण धरातल को विभिन्न रंगों की पट्टियों में बाँट दिया गया है या एक स्थान को दूसरे से पृथक् करने हेतु बीच में टीला बना दिया गया है ।

रंग

( 10 ) रंग – अधिकांशतः चटकीले रंग प्रयुक्त हुये हैं । चित्रों में लाल , पीले , लाजवर्दी ( नील ) , हरा , जोगिया , श्वेत और काले रंगों का प्रयोग हुआ है । स्वर्ण रंग को बादलों में बिजली की चमक दिखाने में , पुरुषों के मुकुट में और स्त्रियों के आभूषण एवं उनके वस्त्रों के किनारों के अंकन में और कहीं – कहीं दानवी आकृति के चेहरे की भयानकता को उभारने के लिये आँख के डैयों को बनाने में प्रयोग किया गया है । महाराजा जगतसिंह के काल के मेवाड़ के चित्रों में रंगों के प्रयोग की एक विशिष्टता यह भी है कि भार वाली वस्तुओं के रंगों में गहरापन अधिक है , उनको उर्जस्वितमा अधिक तीव्र है तथा हल्की वस्तुओं के अंकन में हल्के न्यून उर्जस्वितमा वाले रंगों का प्रयोग किया गया है । इस प्रकार के प्रयोग ने चित्रों के सम्पूर्ण संघटन में सहज स्वाभाविकता को उत्पन्न किया है तथा संबंधित चित्र के कथ्य एवं भावों की सम्प्रेषण को काफी बढ़ा दिया है ।

भाव

( 11 ) भाव – कृष्णलीला संबंधी विषयवस्तु को आधार बनाकर प्रेम , समर्पण , श्रद्धा , उत्सर्ग , शृंगार इत्यादि भावनाओं को व्यक्त करने वाले अनेकानेक चित्रों का सृजन मेवाड़ में हुआ । मुगलों के सम्पर्क से मुगल चित्रकला की बाह्य उत्तेजना , लालित्य एवं कमनीयता का समावेश हुआ ।

देवगढ़ शैली

देवगढ़ मेवाड़ की सीमा से लगा हुआ है यह महाराणा जयसिंह के राज्यकाल में रावत द्वारिका दास चूँडावत द्वारा सन् 1680 ई . में बनाया गया था।
यहाँ के रावत ‘ सौलहवें उमराव ‘ कहे जाते थे, जो प्रारम्भ से ही चित्रकला में गहरी रुचि रखते थे। महाराणा संग्रामसिंह व महाराणा जगतसिंह द्वितीय के समय में मेवाड़ के चित्रों के अनुरूप ही देवगढ़ में भी सन् 1710-1720 ई . के मध्य भित्तिचित्र बने ।

ऐसा प्रतीत होता है कि उदयपुर नगर के चित्रकारों को ही इस कार्य के लिये लगाया गया होगा हो। देवगढ़ के अन्य महलों में अजारा की ओबरी ,मोती महल ‘ आदि में भी भित्तिचित्र देखने को मिलते हैं । यहाँ के अधिकतर चित्र ‘ चित्रकार चौखा ‘ की चित्रण पद्धति में बने हुए हैं ।

देवगढ़ के कपड़द्वार महलों में कई चित्र इसी प्रकार के बने हैं , जिनमें शिकार , हाथियों की लड़ाई , राजदरबार का दृश्य , कृष्ण – लीला आदि के चित्र विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं ।

सन् 1728 ई . में जयपुर के राजा ‘ माधोसिंह ‘ को ‘ देवगढ़ की राजकुमारी ‘ ब्याही गई थी । राजा की मृत्यु के बाद महारानी चूड़ावत जी जयपुर राज्य का पूर्ण कामकाज देख रही थी । तथा इसमें रावत जसवंतसिंह ने उन्हें सहायता दी , इस काल में निर्मित ‘ रावत जसवंतसिंह ‘ का चित्र जयपुर शैली में ही बना जिसमें मुगल एवं जयपुर का शैलीगत प्रभाव है । यह चित्र म्यूजियम ऑफ फाइन आर्ट्स , बोस्टन संग्रहालय में सुरक्षित है । महाराजा ‘ भीमसिंह ‘ के राजकाल (1786-1724 ई .) में देवगढ़ के राघवदास एवं मेवाड़ के संबंध पुनः स्थापित हुये । अतः भौगोलिक , वैवाहिक , रक्त और सांस्कृतिक संबंधों के कारण क्रमश : मारवाड़ , जयपुर और मेवाड़ की कला की विशेषताओं को अंगीकार कर यहाँ के चित्रकारों ने जो चित्र बनाये , उनकी अलग ही पहचान है ।

उदाहरण – मोटी सधी हुई रेखाएँ , मेवाड़ शैली के विपरीत हरे , पीले रंगों काअधिकाधिक प्रयोग , पुरुष और स्त्रियों की आकृतियों में निकटवर्ती मारवाड़ का प्रभाव , चित्रकारों एवं उनके आश्रयदाताओं से घनिष्ठ संबंध आदि ने चित्रकला के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया । शिकार , गोठ , अन्तःपुर , राजसी ठाठबाट , शृंगार , सवारी , धार्मिक एवं ऐतिहासिक घटनाओं आदि के लोक कलात्मक चित्रण ने देवगढ़ की चित्रकला को महत्त्वपूर्ण बना दिया । सायद इसी दृष्टि से इसको मेवाड़ की उपशैली का स्थान दिया गया । देवगढ़ में निर्मित चित्र आज विभिन्न संग्रहालयों में सुरक्षित हैं ।

देवगढ़ शैली के चित्रकार

देवगढ़ शैली के चित्रकार – देवगढ़ के प्रमुख चित्रकारों में बगता और कंवला प्रथम थे । बगता ने कुँवर अनूप सिंह द्वारा सूअर का शिकार करते हुए बनाया तथा शिकार के पश्चात् गोठ – इस चित्र में राजकुमार अनोपसिंह शिकार से लौटते समय विश्राम करते दिखाये गये हैं । रावत गोकुलदास घोड़े पर सवार , रावत गोकुलदास श्रीनाथ जी की पूजा करते हुये , शिकारी कुत्ते का चित्र एवं सूर्य पूजा ये तीनों चित्र वर्तमान में प्रिन्स ऑफ वेल्स संग्रहालय मुम्बई में सुरक्षित हैं । रावत राघवदास का चित्र – चित्रकार ‘ कंवला ‘ द्वारा 1778 ई . का चित्रित है ।

कंवला द्वितीय ,चौखा तथा बैजनाथ ने देवगढ़ में रहकर देवगढ़ शैली को अधिक समृद्धशाली बनाया ।परन्तु कुछ समय बाद कंवला द्वितीय बदनोर चले गये ,वहा उन्होंने अपनी निजी शैली का विकास किया ।
चौखा द्वारा बनाये गए प्रमुख चित्रों में रावत गोकुलदास अपने दरबारियों के साथ होली खेलते हुये ,रति क्रीड़ा ,गोधूलि बेला हैं ।

देवगढ़ अभिलेखों में चित्रकार हरचन्द एवं नंगा का उल्लेख बदनोर के चित्रकारों से मिलता है । चित्रकार नंगा महाराजा जगतसिंह द्वितीय के राज्य में उदयपुर में भी उल्लेखनीय कार्य करते रहे ।
बैजनाथ कलाकार द्वारा चित्रित रावत नाहरसिंह जनाना प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय मुम्बई में सुरक्षित है । नाहरसिंह की प्रेमिका को प्याला देते हुये , कर्नल टॉड की सवारीऔर ‘ नाहरसिंह द्वारा सुअर का शिकार ,अन्य प्रमुख चित्र हैं ।सर्वप्रथम इस उपशैली को प्रकाश में लाने का श्रेय ‘ श्रीधर अंधारे ‘ को जाता है ।

नाथद्वारा शैली

मेवाड़ की राजधानी उदयपुर से पाँच मील दूर उत्तर दिशा में घने पहाड़ों के बीच कला एवं संस्कृति का केन्द्र ‘ नाथद्वारा ‘ का नाम विश्व विख्यात है । इस शैली का प्रारम्भ और विकास नाथद्वारा में ‘ श्रीनाथ जी ‘ के स्वरूप की स्थापना 10 फरवरी , 1672 ई . के बाद में माना जाता है ।

नाथद्वारा
नाथद्वारा श्री कृष्ण नाथ जी के रूप में

नाथद्वारा नामकरण

औरंगजेब की अनेक आनीतियो ने समाज में तहलका मचा दिया वह हिन्दू देवी देवताओ के स्थानों व मंदिरो को उजाड़ने लगा । ऐसी ही कुछ वजहो से ब्रज प्रदेश के कुछ मंदिरों के पुजारियों ने भव्य मंदिरों का मोह छोड़ दिया और उन आराध्य मूर्तियों को बचाने में जुट गये । गोवर्धन पर्वत पर स्थित वल्लभ संप्रदाय वालों के प्रमुख मंदिर ‘ श्रीनाथ जी ‘ के विग्रह को लेकर वहाँ के गोस्वामी ‘ श्री दामोदर जी ‘ तथा उनके चाचा ‘ गोविन्द जी ‘ 30 सितम्बर , सन् 1669 ई . को गोवर्धन से निकले और इधर – उधर शरण लेते हुए कोटा , बूंदी , किशनगढ़ , पुष्कर तथा जोधपुर गये , किन्तु औरंगजेब के भय से किसी ने भी उस मूर्ति को अपने राज्य में स्थापित नहीं होने दिया । बाद में मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने इस मूर्ति को सहर्ष स्वीकारा और 10 फरवरी , सन् 1672 ई . को ‘ सीहाड़ गाँव ‘ में एक भव्य आयोजन के साथ श्रीनाथ जी की स्थापना की और तभी से ही इस गाँव का नाम ‘ नाथद्वारा ‘ पड़ गया और इस प्रकार मेवाड़ वैष्णव धर्म का केन्द्र बन गया ।

कहा जाता है कि श्रीनाथ जी की प्रतिमा के साथ – साथ अनेक भक्त चित्रकार भी मथुरा एवं वृन्दावन से आये और अपने हाथों श्रीनाथ जी के विग्रह चित्र बनाये ( श्रीनाथ जी के प्राकट्य एवं लीलाओं से संबंधित तथा अष्टयाम की सेवा पूजा के असंख्य चित्र कागज व कपड़े पर बने ) और नाथद्वारा दर्शनार्थ आने वाले धर्म – परायण एवं कला प्रेमी लोग श्रीनाथ जी के चित्र खरीद कर ले जाते थे । यहाँ चित्रकारिता के साथ – साथ अन्य कलाएँ , जैसे – मीनाकारी , पच्चीकारी इत्यादि भी विकसित हुईं 12 -18 वीं शताब्दी में निर्मित ‘ कृष्ण श्रीनाथ जी के रूप में इस शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है

ब्रज एवं मेवाड़ की सांस्कृतिक परम्परा के समन्वय से धीरे – धीरे नाथद्वारा शैली का विकास होने लगा । नाथद्वारा जैसे छोटे से कस्बे में चित्रकला इतने बड़े पैमाने पर विकसित हुई है , उसमें श्रीनाथ जी के अतिरिक्त मुख्य कारण और भी रहे हैं । प्रथम तो यह कि इस सम्प्रदाय में हाथ – कलम के चित्रों से ही पूजा का विधान रहा तथा दूसरा यह कि यहाँ के चितेरे परस्पर सहयोग एवं प्रतिस्पर्धा से काम करने की टेव लिये हुए थे । मंदिर में ‘ धीली पाटिया ‘ नामक स्थान पर संध्या समय भगवान के भोग के दर्शन से सदन की आँखी तक बैठकर यहाँ के चित्रकार अपने चित्र बनाकर स्वयं ही बेचते रहे ।

नाथद्वारा शैली के चित्रकार

आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व ‘ बाबा रामचन्द्र ‘ जयपुर से आकर यहाँ बस गये थे । उनकी शैली में ब्रजमण्डल के प्रकृति परिवेश के पेड़ – पौधों में नवीनता प्रदर्शित है । इस प्रकार उनके तुलना किसी अन्य कलाकार से नहीं की जा सकती । कुछ विशेष चित्रकार निम्न प्रकार से है –
नारायण , चतुर्भुज , रामलिंग , चम्पालाल , घासीराम , तुलसीराम , उदयराम , देवकृष्ण , हरदेव।, हीरालाल , विटुल ,भगवान आदि चित्रकारों के नाम प्रसिद्ध हैं । महिला कलाकारों में ‘ कमला ‘ एवं ‘ इलायची ‘ का नाम भी उल्लेखनीय है ।

नाथद्वारा शैली के चित्र

नाथद्वारा शैली के दृश्य चित्र भी उच्चकोटि के सस्ते व अपनी सुन्दरता के लिये संसारभर में प्रसिद्ध हैं । यहाँ का चित्रकार पत्तियाँ एवं गुच्छे बनाने के लिये विशेष प्रकार की तूलिका तैयार करते हैं । किनार व खत खींचने वाले , मानवाकृतियाँ बनाने वाले अलग – अलग अपने क्षेत्र के प्रमुख चित्रकार होते हैं । दृश्य चित्रों में प्राचीन पाश्चात्य एवं अर्वाचीन प्रभाव दर्शित होता है , किन्तु ये तीनों मिलकर नाथद्वारा कलम चित्रों की भी वृद्धि करने में सहायक हैं । नाथद्वारा शैली में अपभ्रंश मेवाड़ , मारवाड़ एवं जयपुर शैलियों का संगम हुआ है ।

नाथद्वारा शैली का पतन

19 वीं -20 वीं शताब्दी में नाथद्वारा शैली में व्यापारिक बहुल चित्रण के कारण रंगों में बिखराव , रेखाओं में भद्दापन तथा फोटोग्राफी का प्रभाव आने लगा , जिससे यहाँ की कला पतन की ओर चली गयी परन्तु नाथद्वारा शैली की चित्रण परम्परा आज भी प्रचलित है । श्रीनाथ जी के स्वरूप और पिछवाइयों के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के कारण लगभग 35 परिवारों के पुश्तैनी चित्रकार आज भी नाथद्वारा में चित्रांकन कर जीविकोपार्जन कर रहे हैं ।

इस प्रकार नाथद्वारा की चित्रकला और चित्रकारों ने भारतीय चित्र परम्परा और स्थानीय विशेषताओं एवं मान्यताओं को ओझल नहीं होने दिया । साथ ही नाथद्वारा की चित्रशैली आने वाले युग में भी असंख्य चित्रकारों के लिये प्रेरणादायी रहेगी ।

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